(अठारहवाँ विषय)
घूंघट और पर्दा प्रथा
शाहिदा : अब पर्दा करने के बारे में भी अपनी और गीता की राय बताइए।
वेदांत : पर्दा जैसे व्यर्थ विषयों पर कृष्ण ने कभी बात नहीं करी है, क्योंकि ये परंपराएं वास्तव में अनावश्यक हैं। सनातन शास्त्रों में पर्दा जैसा कुछ नहीं कहा गया है पर हिन्दू यानी सनातन धर्म में पर्दा परंपरा का पालन करने का भी कोई विशेष महत्व नहीं है। इसे किसी भी सनातन धर्म के ग्रंथ, शास्त्रों से आवश्यक सिद्ध नहीं किया जा सकता है। क्योंकि सनातन धर्म में महिलाओं को अपराधियों के जैसे मुँह छुपाकर रखने के लिए कभी नहीं कहा गया है।
शाहिदा : इसका प्रमाण दो, क्या आपके पास कोई सबूत है इसका सनातन ग्रंथों से? क्षमा करना मैं प्रत्येक बात का सबूत इसलिए मांग रही हूँ, ताकि मेरे मन में कोई संशय न रह जाए।
वेदांत : एतिहासिक महान ग्रंथ ‘श्रीमद रामायण’ के युद्धकाण्ड अध्याय 114 श्लोक 27 में स्वयं ‘भगवान श्री राम’ ने बताया है इस विषय में। उन्होंने विभीषण को समझाया कि “घर, कपड़े और चार दिवारी आदि वस्तुएं महिलाओं के लिये आवरण या पर्दा नहीं होती हैं। (अन्य पुरुषों की दृष्टि से अपनी महिलाओं को दूर रखना भी पर्दा नहीं होता है) वास्तव में महिलाओं के लिए पर्दा होता है, उनके पति से प्राप्त होने वाला सत्कार यानी सम्मान और उनके अपने सदाचार यानि अच्छे गुण” कुछ अज्ञानियों ने विदेश से आई हुई परम्पराओं को ही भारतीय संस्कृति समझ लिया है। चलिए मुझे ये बताइये कि इस्लाम में पर्दा की परंपरा कब आयी थी?
शाहिदा : तभी जब सभी आयतें आ रही थी मुहम्मद पर।
वेदांत : मैं आपको बताता हूँ कि सच्चाई क्या है। दरअसल मुहम्मद के विशेष मित्र और इस्लाम के दूसरे खलीफा कहे जाने वाले ‘उमर’ की वजह से ही इस्लाम में पर्दा प्रथा आयी थी। उमर यहूदी और दूसरे मज़हब के जैसे ही मुस्लमान महिलाओं के लिए भी पर्दा की परंपरा लागू करना चाहते थे। इसका उल्लेख उमर ने मुहम्मद से भी कई बार किया था। पर फिर भी मुहम्मद इस विषय को शुरुवात में स्वीकार नहीं कर रहे थे। पर एक बार उमर ने कुछ ऐसा किया कि मुहम्मद साहब को ये विषय स्वीकार करना ही पड़ गया।
शाहिदा : ऐसा क्या हुआ?
वेदांत : उस समय में आज के जैसे शौचालय नहीं हुआ करते थे, इसलिए वहाँ के कई लोग ‘अल-मनासी’ नाम की जगह पर शौच यानी सुसु-पॉटी करने जाते थे। एक रात को मुहम्मद साहब की एक बीवी जिनका नाम ‘सौदा’ था, वो शौच करने के लिए अल मनासी गयी थी। लेकिन उस जगह पर उमर पहले से उपस्थित थे, उन्होंने सौदा से कहा कि मैंने तुम्हें पहचान लिया। और फिर जब ये बात मुहम्मद साहब को पता चली, तब उनपे अल्लाह ने भी महिलाओं को पर्दा करवने की आयत भेजना शुरू कर दिया। ये पुस्तक ‘अल बुखारी’ की हदीस 146 है। अब प्रश्न ये है कि मुसलमानों के अनुसार क़ुरान की आयतें तो अल्लाह अपनी इच्छा से मुहम्मद पर अंतिम नियम के रूप में भेजते थे, तो फिर अगर पर्दा इतना आवश्यक था अल्लाह की दृष्टि में, तब उन्होंने पहले ही दिन ऐसी आयत क्यों नहीं भेजी? उमर की इच्छा अनुसार इतने सालों बाद ही क्यों आयत भेजी गयी? और तब ही क्यों भेजी गयी जब उमर ने मुहम्मद की बीवी को शौच के स्थान पर पहचान लिया था? मुहम्मद साहब की पहली बीवी और इस्लाम क़ुबूल करने वाली सबसे पहली महिला ‘ख़ादिजा’ को इस्लाम में बहुत सम्मान दिया जाता है। क्योंकि ख़दिजा एक बहुत धनवान और एक व्यापारी महिला दी, मुहम्मद भी पहले उन्हीं के पास नौकरी किया करते थे। जहाँ ख़दिजा एक बहुत अमीर महिला थीं, वहीँ मुहम्मद आर्थिक रूप से धनवान नहीं थे। ख़दिजा ने मुहम्मद को शादी का प्रस्ताव दिया, ज़ब वह लगभग 40 वर्ष की थीं और मुहम्मद 25 वर्ष के थे। उनका शादी सम्बन्ध भी लगभग 25 वर्ष तक चला था। जब तक ख़दिजा का देहांत नहीं हुआ तब तक मुहम्मद साहब ने दूसरी शादी नहीं करी थीं। लेकिन जैसे ही ख़दिजा का देहांत हुआ और उनकी सारी संपत्ति तथा व्यापार मुहम्मद साहब के नाम पर हो गया, उसके बाद ही मुहम्मद ने अधिक शादियाँ करना शुरू किया। तो मुहम्मद को अपनी पहली पत्नी के धन और संपत्ति के माध्यम से इस्लाम का प्रचार करने में बहुत सहायता मिली। लेकिन जो ख़दिजा इस्लाम में इतना विशेष दर्जा रखती हैं, उन्होंने अपने जीवन में कभी पर्दा क्यों नहीं किया?
शाहिदा : तब तक तो पर्दा करने की आयत आई ही नहीं थी, तो फिर वो पर्दा क्यों करतीं? इस्लाम के शुरू होने के 25 से भी अधिक वर्ष बीत जाने तक पर्दा करने की कोई आयत नहीं आयी। इससे ही स्पष्ट पता चलता है कि पर्दा करने की आयत किसी ईश्वर-अल्लाह नहीं, बल्कि उमर के कारण आयी थी। पर क्या हिन्दुओं की घूंघट प्रथा भी पूर्ण रूप से विदेशी है?
वेदांत : महिलाओं का सर पर घूंघट रखना आदर-सम्मान के लिए या फैशन के लिए किया जाता है। जब भी वो किसी ऐसे व्यक्ति से मिलती हैं जो संबंध में बड़े और बहुत सम्मानित होते हैं, तब सर पर घूंघट कर लेती हैं, हालांकि ये भी आवश्यक नहीं है। जिस प्राकर से लड़कियां अपने बालों को पूरा बांधकर और लड़के अपनी शिखा को बांधकर ही भगवान के विग्रह को भोग लगाते हैं। ऐसा करना केवल आदर सम्मान के लिए है इसका अध्यात्म से सीधा-सीधा कोई संबंध नहीं है। हाँ! घूंघट करना हमारी परंपरा अवश्य है, पर हमारे देश की संस्कृति महिलाओं को पर्दे में छुप कर रहने की नहीं है। बल्कि हम उस संस्कृति से हैं जिसमें महिलाओं को पर्दे में रहने के स्थान पर पुरुषों को संस्कारी बनने पर ध्यान दिया गया है।
शाहिदा : यानी सारी गलती पुरुषों की है जो वो महिलाओं को देखते हैं? क्या आप ये कहना चाह रहे हो कि पुरुषों को ही महिलाओं की ओर नहीं देखना चाहिए?
वेदांत : संस्कार का तात्पर्य ये नहीं है कि पुरुष-महिलाओं को देखना ही बंद के दें, क्योंकि ऐसा करना महिलाओं का अपमान करने के जैसा होगा। पर जिनके साथ आपका जैसा संबंध है, आप वैसी ही दृष्टि से उन्हें देखें। गँवार लोग तो स्त्री-पुरुष के संबंध को केवल अश्लीलता तक ही सीमित समझते हैं। उनके अनुसार हर अन्य पुरुष-स्त्री का संबंध केवल इसके लिए ही है। इसलिए वो लोग अस्थिर रहते हैं।
शाहिदा : पर जो पुरुष महिलाओं को केवल एक वस्तु समझते हैं या जो महिलाएं स्वयं को एक कामपूर्ति और मनोरंजन की वस्तु के जैसे दिखाना चाहती हैं, वो अनुचित नहीं हैं क्या?
वेदांत : अवश्य अनुचित है।
शाहिदा : मौलाना लोग कहते हैं कि इसलिए ही तो इस्लाम ने महिलाओं को बिल्कुल छुपकर रहने का आदेश दिया है।
वेदांत : पर वास्तव में महिलाओं को वस्तु यानी खिलौने (सैक्स टॉय) की दृष्टि से देखना भी तो आपके मौलानाओं के समाज ने ही सिखाया है। मुहम्मद ने कहा है कि अगर कोई महिला अपने पति को शारीरिक सम्बन्ध बनाने के लिए मना कर दे तो सारी रात फरिश्ते उसे लानत यानि धिक्कार भेजते रहते हैं। और इस्लाम में पुरुषों को उनके मनोरंजन के लिए 4 पत्नियों की अनुमति है, यहाँ तक कि जन्नत में भी अल्लाह ने पुरुषों के लिए खिलौने के रूप में 72 हूरें बनाई हुई है। केवल इतना ही नहीं इस्लाम में पुरुष अपनी दासी लड़की के साथ भी सम्बन्ध बना सकते हैं, क्या ऐसा करना आपकी दृष्टि में उचित है?
शाहिदा : कइयों का मानना है कि पुरुषों को स्त्रियों के मुकाबले में अधिक वासना तृप्ति करने का मन करता है।
वेदांत : ये बात आपको कैसे पता कि ऐसा सच में है? कई लड़के तो ‘गेय’ यानी लड़को को ही पसंद करने वाले होते हैं, और कई लड़के नपुंसक भी होते हैं। ये तो आप लोगों ने अपनी ही बुद्धि से माना हुआ है, पर ऐसा है नहीं। वास्तव में हमारे छोटी सोच रखने वाले समाज ने इस बात को सामान्य मान लिया है, उसी प्रकार से जैसे कोई पुरुष शराब पिये तो उसे सामान्य बात कहते हैं, पर महिला पिये तो उसे गलत कहते हैं। जबकि शराब पीना पुरुष और स्त्री दोनों के लिए एक जितना ही अनुचित है।
शाहिदा : हाँ ये बात तो हमें स्वीकार करनी ही पड़ेगी कि इस्लाम में महिलाओं से सारे अधिकार ही छीन लिए गए हैं। यही कारण है कि आज कल कि महिलाएं गृहणी बनने को गुलामी कहती हैं।
वेदांत : जबकि सनातन धर्म ने सिखाया है कि पति अपनी पत्नी पर चिल्ला भी नहीं सकता और मारना पीटना तो दूर की ही बात है। क्योंकि पत्नी शरणागत होती है और पति शरण होता है, पत्नी अपने परिवार को छोड़कर अपने पति के पास आती है इसलिए पत्नी पर पति का कोई अधिकार नहीं होता। हाँ! पत्नी का पति पर अधिकार हो सकता है, इसलिए पत्नी-पति पर चिल्ला भी सकती है, हालांकि चिल्लाना नहीं चाहिए लेकिन अनुमति अवश्य है।
शाहिदा : जो पुरुष महिलाओं को केवल एक वस्तु समझते हैं, या जो महिलाएं स्वयं को एक मनोरंजन की वस्तु के जैसे दिखाना चाहती है, वो अनुचित हैं या नहीं?
वेदांत : इस विषय में आपने केवल दो प्रकार के लोगों का उल्लेख किया हैं, पर इस विषय में कुल 4 प्रकार के लोगों का उल्लेख करना चाहिए। एक तो वो महिलाएं जो स्वयं को वस्तु के जैसे दिखाकर पुरुषों को आकर्षित करना चाहती हैं। दूसरे वो पुरुष जो महिलाओं को एक वस्तु के जैसे देखते हैं। तीसरे वो लोग जो महिलाओं को पर्दा करके रखना चाहिए - ऐसे विचार रखते हैं। और चौथे वो लोग जो वास्तव में आध्यात्मिक हैं। जो महिलाएं स्वयं की सुंदरता दिखाकर पुरुषों को या संसार में किसी को भी आकर्षित करना चाहती हैं, वो ठीक नहीं कर रही हैं। क्या लाभ उन लोगों के सामने दिखावा करके जो आपकी केवल एक कमी के कारण आपके अनेकों गुणों को भुला देते हैं? और क्या लाभ उन लोगों के लिए सजने का जो वास्तव में आपके लिए निस्वार्थ सेवा करने के स्थान पर बस आपके शरीर के साथ खिलवाड़ करने के सपने देखते हैं? वो लोग जो आपको बस एक आनंद देने की वस्तु समझते हैं उनके आगे सुंदरता का दिखावा करने की क्या आवश्यकता है? जो पुरुष-महिलाओं को वस्तु के जैसे देखते हैं वो भी उन्हीं महिलाओं के जैसे ही गँवार हैं जो अपने-आपको केवल वस्तु दिखाना चाहती हैं।
शाहिदा : पर अगर स्त्री-पुरुष एक दूसरे को देखेंगे, तब आकर्षण तो होगा ही-ना?
वेदांत : इसमें गलती आपकी है कि आपने स्त्री-पुरुष का संबंध मात्र एक ही समझा हुआ है। क्या भाई-बहन, माँ-बेटे, पिता-बेटी, ये सब संबंध स्त्री और पुरुष के नहीं है? क्या आप श्रृंगार नहीं करते हो? क्योंकि लगभग हर स्त्री को सजने का तो बहुत शौक होता है।
शाहिदा : अवश्य करती हूँ।
वेदांत : ठीक से समझा जाये तो एक प्रकार से अगर हम अपने-आपको आत्मा के रूप में न जानकर केवल शरीर से ही अपना परिचय करते हैं तब तो हम एक वस्तु ही-हैं। और अगर हम अपने-आपको एक आत्मा के रूप में भी जानते हैं तब भी हम जिस शरीर में हैं, वो पदार्थ से ही बना है। इसलिए किसी महिला या पुरुष की सुंदरता देखना भी कोई बुरी बात नहीं है। पर संबंधों की मर्यादा रखनी चाहिए।
शाहिदा : यानी?
वेदांत : यानी प्रत्येक लड़की या लड़के की सुंदरता के कारण उससे कामुक रूप से आकर्षित हो जाना गलत है। जो वस्तु या व्यक्ति सुंदर है उसे देखने से निश्चित ही अच्छा लगता है चाहे वो कोई इमारत हो, महिला हो या फिर पुरुष हो। क्योंकि उसमें हम भगवान कृष्ण के ही गुणों को देखते हैं। बस अगर हम अपने विचारों को पवित्र बना लें तो ये पूर्ण रूप से सामान्य है। क्योंकि वो लोग जो महिलाओं को पर्दा करना चाहिए, ऐसी सोच रखते हैं, उन लोगों के तर्क भी मानने योग्य नहीं होते हैं। वास्तव में ऐसे लोग स्वयं अंदर से काम वासना से भरे हुए होते हैं और महिलाओं को देखकर उनसे कामुक रूप से आकर्षित हो जाते हैं। कामुकता बढ़ने के कारण से ही वो बेचैन हो जाते हैं, पर अकारण स्वयं को संस्कारी और आध्यात्मिक दिखाने के लिए इस प्रकार की बातें किया करते हैं। क्योंकि जो लोग वास्तव में आध्यात्मिक हैं, वो तो ऐसी बातें नहीं करते। कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनका मानना है कि महिलाओं को अपनी सुंदरता केवल अपने पति को ही दिखानी चाहिए। और जो महिलाएं विश्वभर को सुंदरता दिखा रही हैं उन्हें अपना पहनावा बदलने की आवश्यकता है। लेकिन महिलाओं को बस अपने पति को भी सुंदरता क्यों दिखानी चाहिए? पति को सौंदर्य से क्या लेनादेना है? जो आपको सच में प्रेम करता है उसे आपके रंग, रूप और सुंदरता से कोई लेनादेना नहीं होता। बल्कि आपके प्रेमी को तो आप हर भेष, रूप और स्थिति में सुन्दर ही दिखोगे। पति और पत्नी का संबंध भी सुंदरता पर नहीं, बल्कि मित्रता पर टिका होना चाहिए। जिन लोगों को अपनी पत्नी या अपने पति की सुंदरता से अधिक आकर्षण है, ये मान लेना चाहिए कि उनकी शादी सफल ही नहीं है। जो पुरुष किसी महिला के रंग, रूप और सौंदर्य से आकर्षित होकर उससे शादी करता है, वो एक प्रकार से उस महिला को अपनी पत्नी नहीं, बल्कि वैश्या समझकर ही अपने घर ले जाता है। क्योंकि सुंदरता की भूमिका तो बस उसी तक ही सीमित है, उससे अधिक नहीं। केवल शारीरिक संबंद के सिवा ऐसा कौनसा दूसरा कार्य है जिसमें रंग, रूप और सुंदरता का महत्व हो?
शाहिदा : कोई नहीं।
वेदांत : अगर कोई महिला अपनी प्रसन्नता के लिए या मनोरंजन के लिए श्रृंगार करती हैं या फिर कैसे भी प्रकार के कपड़े पहनती है, मैं केवल उसे ही उचित समझता हूँ। क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की अपनी - अपनी इच्छाएं होती है, और आपने अवश्य ही ध्यान दिया होगा कि जब आप-अपने पसंदीदा कपड़े पहनते हो या श्रृंगार करते हो तब आप अधिक आत्मविश्वास और प्रसन्नता अनुभव करते हो। मुख्य तौर पर महिलाओं को पहनावा बदलने की नहीं बल्कि अपनी सोच में बदलाव करने की आवश्यकता अधिक है। इसका तात्पर्य ये है कि सभी को विश्व की अधिक परवाह करना बंद कर देना चाहिए। क्योंकि जो कोई व्यक्ति स्वयं को और भगवान को छोड़कर इस भौतिक जगत के विषय में विचार कर रहा है वो गलत ही कर रहा है। क्योंकि चाहे महिला हो या पुरुष हो, वास्तव में वो केवल भगवान कृष्ण के लिए ही है, इसलिए किसी को भी अपनी वस्तु समझने के स्थान पर कृष्ण का समझना चाहिए। पर्दा करने या न करने में, और किसी भी प्रकार के कपड़े पहनने पर अध्यात्म में इसका महत्व क्यों होगा? अगर कोई महिला केवल अपनी प्रसन्नता के लिए श्रृंगार करती है और अपने मनचाहे वस्त्र पहनती है तो उसमें बुराई ही क्या है?
शाहिदा : क्या आपके अनुसार महिलाओं का छोटे-छोटे कपड़े पहनना उचित है?
वेदांत : मेरे अनुसार महिला हो या पुरुष, जो भी व्यक्ति किसी को कामुक रूप से आकर्षित करने के उद्देश्य से, किसी भी प्रकार के कपड़े पहनता है, वो गलत है। अगर उद्देश्य किसी को कामुक रूप से आकर्षित करना नहीं है, तो किसी भी प्रकार के कपड़ो में, मैं उचित अनुचित का भेद नहीं कर सकता - ऐसा मेरा मत है। बात रही पर्दा करने की तो पर्दा केवल महिलाओं को ही क्यों करना चाहिए? क्या महिलाएं पुरुषों को देखकर आकर्षित नहीं होती? अवश्य होती है, लेकिन यहाँ पर भी बात केवल पुरुषों के अहंकार की है। वो चाहते हैं कि हमारी बहन, बेटी, पत्नी आदि की सुंदरता देखकर उनके विषय में कोई मलीन विचार न रखे। पर ऐसी सोच रखने वाले लोग स्वयं बहुत सारी स्त्रियों के ऊपर मलीन दृष्टि रखते हैं। वास्तविक आध्यात्मिक पुरुषों के सामने तो उसकी पत्नी के सिवा कोई भी पराई स्त्री बिल्कुल ही कपड़ों के बिना यानी निर्वस्त्र भी खड़ी हो जाएगी, तो उनके मन में उस निर्वस्त्र महिला को देखकर भी कोई कामुक विचार नहीं आएंगे। क्योंकि आध्यात्मिक लोग अपने मन को पूर्ण रूप से वश में कर चुके होते हैं। वो ये जानते हैं कि उनके लिए क्या विचार करना ठीक है और क्या अनुचित है। पर मैं ऐसा भी नहीं कह रहा हूँ कि लड़कियां जो चाहे वैसे ही कपड़े पहनें। चाहे पुरुष हो या महिला, सभी को पहनावे में थोड़ा तो मर्यादित रहना ही चाहिए। अगर कोई महिला अपनी प्रसन्नता के लिए या फिर आराम अनुभव करने के लिए किसी भी प्रकार के वस्त्र पहन रही है तो उसमें आपको ध्यान देने की भी क्या ही आवश्यकता है? आपने उन ‘नागा' बाबाओं के विषय में तो सुना ही होगा जो बिल्कुल भी वस्त्र नहीं पहनते, पूर्ण निर्वस्त्र रहते हैं। कई लोग नागा बाबाओं को मलीन और असभ्य समझते हैं। वो लोग असभ्य तो हैं, पर नागा बाबाओं के वस्त्र न पहनने के पीछे ये प्रमाण है कि उनके मन से सभी कामुक विचार समाप्त हो गए हैं। क्योंकि वैज्ञानिक रूप से अगर वो किसी भी स्त्री के प्रति कामुक होंगे तब उन्हें देखने वालों को तो तुरंत ही पता चल जायेगा। उनके कपड़े न पहनना इस विषय में उनकी पवित्रता का प्रमाण है। ऐसा करना अवश्य ही मूर्खता है और शास्त्रों में बिल्कुल नग्न रहने के लिए नहीं कहा गया है, वो नागा बाबा लोग अपनी इच्छा से ही ऐसा कर रहे हैं। हालांक भागवत कथा सुनाने वाले ‘श्री सुखदेव गोस्वामी’ जी ने भी आजीवन वस्त्र नहीं पहने, पर उनके ऐसा करने के पीछे का कारण पूर्ण रूप से संसार से आसक्ति का त्याग था।
शाहिदा : पहले मेरी सोच ये थी कि महिलाओं को केवल पर्दे में रहना चाहिए। पर आपकी बातों को सुनकर मुझे अध्यात्म समझ आने लगा है।
वेदांत : अगर पर्दे में रहने का अर्थ गुप्त अंगों को ढकना है, तब तो ठीक है। लेकिन ऊपर से लेकर नीचे तक पूरा ढका रहना न असभ्यता है, न मूर्खता है, लेकिन आवश्यक भी नहीं है। जिन लोगों को महिलाओं के पहनावे में नग्नता दिखती है, ऐसे लोग या तो स्वयं अंदर से बहुत कामुक होते हैं या फिर मूर्ख होते हैं। शास्त्रों में ऐसे लोगों को चरित्रहीन माना गया है, और जो स्वयं चरित्रहीन हैं वो किसी अन्य के चरित्र पर प्रश्न उठा रहे है तो उनको अनदेखा कर देना चाहिए। क्योंकि चरित्रहीन लोग जो कुछ भी कहेंगे या सोचेंगे उससे आपके जीवन पर क्या ही प्रभाव पड़ सकता है?
शाहिदा : कई लोगों का ये भी कहना है कि बलात्कार के मामले भी पर्दा न करने के कारण ही बढ़ रहे हैं।
वेदांत : इस बात से क्या प्रभाव पड़ता है कि कई लोगों का क्या कहना है? प्रभाव इस बात से पड़ता है कि क्या आप भी ऐसे ही विचार रखते हो?
शाहिदा : नहीं, मैं ऐसा नहीं सोचती।
वेदांत : सबसे पहले तो इस विचार को छोड़ना होगा कि घूंघट और बुर्के के बिना रहने वाली महिलाएं निर्लज्ज हैं। क्योंकि ऐसे विचारों का प्रचार करके एक प्रकार से हम अनजाने में ही, पर बलात्कारी लोगों को बलात्कार करने के लिए ही प्रेरित कर देंगे। हालांकि एक रिपोर्ट सामने आयी हैं जिससे पता चला है कि आज के समय में 95% से अधिक बलात्कार भी उन महिलाओं के साथ हो रहे हैं जो बहुत सीधी-साधी और घर से अधिक बाहर नहीं निकलने वाली होती हैं, पर मैं इस रिपोर्ट पर अधिक बात नहीं करना चाहता। ये मैंने बस उन नीच सोच वाले लोगों के लिए बताया है जो पर्दा न करने को बलात्कार के मामले बढ़ने का कारण बताते हैं। हाँ! अगर कोई महिला छोटे कपड़े पहनेगी तो स्पष्ट है कि अभक्त लोग उसे देखकर कामोत्तेजित हो जाएंगे। पर इसपर हम केवल उन महिलाओं को दोष भी तो नहीं दे सकते। इसलिए हमें इस विषय में लड़कों पर अधिक ध्यान देना चाहिए और उन्हें भगवद गीता का आध्यात्मिक ज्ञान सिखाना चाहिए। एक पाकिस्तानी रिपोर्ट के अनुसार यहाँ पर अधिकांश महिलाओं से बलात्कार करने वाले लोग उनके स्वयं के संबंधी होते हैं। बलात्कार के मामले भी केवल मलीन विचारों के कारण बढ़ रहे हैं। वनों में जो अधिकतर जनजाति होते हैं उनमें महिलाएं तो बिल्कुल भी कपड़े नहीं पहनती हैं। पर जो लोग उन जनजातियों पर अनुसंधान यानी रिसर्च करते हैं वो बताते हैं कि ऐसे असभ्य समाज में भी बलात्कार नहीं होते हैं।
शाहिदा : इसका क्या अर्थ हुआ?
वेदांत : जो लोग पर्दाप्रथा का समर्थन करते हैं उनसे पूछिये कि क्या 4-5 वर्ष की बच्चियों को भी पर्दा करवाके रखना चाहिए?
शाहिदा : 4-5 वर्ष की बच्ची को पर्दा करने के लिए कोई क्यों कहेगा? उसको देखकर कौन अपने मन में मलीन विचार ला सकता है?
वेदांत : पर बलात्कारी लोग तो 2 वर्ष की बच्ची को भी नहीं छोड़ते, आपने सुनी ही होंगी ऐसी खबरें। किसी के साथ दुष्कर्म करने के लिए पहले उसके लिए मलीन सोच तो रखनी ही पड़ेगी ना? फिर चाहे वो 3 वर्ष की बच्ची हो या 80 वर्ष की बुढ़िया हो। यहाँ तक कि अधिक काम वासना से भरे हुए लोग तो पशु-पक्षियों के साथ भी दुष्कर्म करते हैं। अभी कुछ दिन पहले ही एक खबर आयी थी कि 3 लड़के एक बड़ी वाली छिपकली यानी ‘मॉनिटर लिज़ार्ड’ के साथ दुष्कर्म करते हुए पकड़े गए। जब छोटी बच्चियों के लिए हमारे समाज में पर्दा न करके रखने की सोच है फिर हम जवान लड़कियों के लिए ऐसी सोच क्यों नहीं रख सकते? जब हमने छोटी बच्चियों के लिए मलीन सोच रखने वाले लोगों को बलात्कारी विचारों वाला कहकर उन्हें अनदेखा कर दिया है। तो फिर हम युवती महिलाओं के लिए मलीन सोच रखने वालों को अनदेखा क्यों नहीं कर सकते हैं? और जो वास्तव में शुद्ध विचारों वाले हैं, वो लोग पुरुषों के संस्कारी बनने का प्रचार करने से अधिक पर्दा प्रथा का प्रचार क्यों कर रहे हैं? उस विषय का प्रचार ही क्यों करना जो समाधान नहीं है। महिलाओं के पर्दा करने के कारण पुरुषों का दूसरी महिलाओं से अधिक आकर्षित होना कुछ समय के लिए टल भी सकता है। पर अगर हम विचारों में बदलाव करेंगे तो ये समस्या समाप्त ही नहीं हो जाएगी? फिर हमें महिलाओं को पर्दा करवाने के स्थान पर विचारों में ही पवित्रता की वैक्सीन नहीं लगानी चाहिए? वैष्णव धर्म का एक प्रसिद्ध गुजराती भजन है जिसका नाम है ‘वैष्णव जन तो'। इस भजन में भगवान कृष्ण के भक्तों के गुणों के विषय में बताया गया है। इस भजन में कुछ ऐसे बोल हैं ‘समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे' जिसका अर्थ होता है कि वैष्णव यानी कृष्ण के भक्त वही होते हैं जो - ‘पूरे विश्व को एक जैसा ही समझते हैं, लालच का त्याग कर चुके हैं और पराई स्त्री को अपनी माँ की दृष्टि से देखते हैं'। जो ज्ञानी लोग हैं वो महिलाओं के पर्दा करने पर नहीं, बल्कि इस भजन में बताए गए भक्तों के गुणों पर ध्यान देते हैं। क्योंकि समाधान तो यही है। इसलिए ही हमारी संस्था इस्कॉन में अपनी पत्नी को छोड़के प्रत्येक अन्य स्त्री को माताजी कह कर बुलाया जाता है, फिर चाहे वो कोई छोटी बच्ची हो या वृद्ध महिला।
शाहिदा : तो क्या आप पर्दा करने को पूर्ण रूप से अनुचित मानते हो?
वेदांत : इस विषय में उचित और अनुचित की बात तो है-ही नहीं। पर्दा से मेरा तात्पर्य हिजाब, बुर्के, घूंघट जैसे पहनावे नहीं है। मैं वस्त्रों की या पहनावे की बात नहीं कर रहा हूँ, जिसको जो पहनने में आराम अनुभव होता है उसको वो ही पहनना चाहिए। मैं पहनावा नहीं विचारों में परिवर्तन करने की बात कर रहा हूं। घूंघट, हिजाब या बुर्के को केवल पहनावा कहा जाना चाहिए, न कि पर्दा। आपकी जो इच्छा है आप वही पहनने के पूरे अधिकारी हो उसमें किसी अन्य को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है।
शाहिदा : आप हर विषय में बिलकुल उचित हो।
वेदांत : मुझसे पहले, और आज के समय में भी इस विषय को मुझसे उत्तम प्रकार से समझाने वाले हज़ारो विद्वान हैं। और मैं तो कोई महान विद्वान भी नहीं हूँ। लेकिन सामान्य तौर पर अधिकांश लोग अधिक समझदार लोगों को सुनने के स्थान पर मूर्खों या अज्ञानियों को सुनना पसंद करते हैं। बीती सदियों में कुछ मूर्खों ने पर्दाप्रथा को अकारण ही अधिक महत्व दे दिया है। एक आम मनुष्य किसी महिला को देखकर सुंदर जैसे शब्द ही कहेगा, जो कि एक प्रकार से प्रशंसा ही-है। पर संस्कारों का ढोंग करने वाले लोग निर्लज्ज और चरित्रहीन जैसे शब्द का प्रयोग करके अपने कुसंस्कार दिखा देते हैं। यहाँ तक कि इस युग में भी 3-4 शादी करने वाले मौलवी लोग तक स्वयं एक महिला से निष्ठावान नहीं रहने को निर्लज्जता नहीं कहते, लेकिन अगर महिला अपराधियों के जैसे ऊपर से नीचे तक पर्दा न करे तो उसे निर्लज्ज कहना शुरू कर देते हैं। ऐसे लोगों पर जब सवाल उठते हैं तो ये स्वयं को सही साबित करने के लिए धर्म का सहारा लेकर कहने लगते हैं कि “नहीं-नहीं हम कामी नहीं है, हम तो बस इस्लाम के कारण अधिक निकाह यानी शादी करते हैं क्योंकि इस्लाम में बताया गया है कि पुरुषों को 4 निकाह करने ही चाहिए"। जबकि वास्तविकता क्या है ये हम सबको पता है, उनके भाषण सुनकर ही पता चल जाता है कि वो कितने अधिक कामुक लोग हैं। पर जिनके लिए अध्यात्म की परिभाषा ही भोग-अय्याशी हो, उनको समझाया भी क्या ही जा सकता है।