(तेइसवाँ विषय)

आत्मा और परमात्मा



वेदांत : पुनर्जन्म को थोड़ा और अच्छे से समझिये। पुनर्जन्म को सिद्ध करने वाला एक श्लोक तो मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ, पर उसको पक्का करने के लिए एक और श्लोक बताता हूँ। ये भगवद गीता के अध्याय 2 का  20, 21 और 22वा श्लोक है। भगवान ने कहा - “ये आत्मा किसी समय में भी न तो जन्म लेता है और न मरता है, न ये उत्पन्न होकर फिर से होने वाला ही है क्योंकि ये अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के नष्ट हो जाने पर भी ये नहीं मरता। हे पृथापुत्र अर्जुन! जो व्यक्ति इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वो कैसे किसी को मरवाता है और कैसे किसी को मारता है? जैसे मनुष्य पुराने कपड़ों को छोड़कर दूसरे नए कपड़े पहनता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को छोड़कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।" पहले कृष्ण ने बचपन, जवानी और बुढ़ापे का उदाहरण देकर पुनर्जन्म के विषय को समझाया था, और फिर वो कपड़ों का उदाहरण देकर समझाते हैं। यानी कृष्ण ये स्पष्ट बता रहे हैं कि पुनर्जन्म तो निश्चित रूप से होता ही है। इसलिए भगवद गीता पर टिप्पणी करने वाले किसी भी अद्वैतवादी को ये अधिकार नहीं है कि वो पुनर्जन्म को गीता के तर्क से नकार दे। आत्मा हमेशा से है और हमेशा रहेगी। हाँ ये सच है कि आत्मा ने कभी जन्म नहीं लिया, जन्म तो मात्र शरीर लेता है। जिस प्रकार से हम पुराने कपड़े बिगढ़ जाने पर दूसरे नए कपड़े पहन लेते हैं, उसी प्रकार ये शरीर जब घिस जाता है और किसी योग्य नहीं बचता, तब आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है। ऐसा नहीं है कि किसी भी आत्मा को किसी भी शरीर में भेज दिया जाता है। दरअसल जो कुछ भी हमलोग करते हैं वो सबकुछ हमारी चेतना में रहता है। मरने के बावजूद भी हमारी चेतना नष्ट नहीं होती, और आत्मा पुरानी चेतना को लेकर पुनर्जन्म की यात्रा करने के लिए निकल जाती है। बच्चा पैदा करने के लिए एक दूसरे का भोग करते समय पुरुष और महिला के संस्कार जैसे होते हैं, वैसी ही चेतना वाली आत्मा महिला के गर्भ में आ जाती है। कभी - कभी किसी देश में रहने वाले व्यक्ति की आत्मा को उस देश में उसकी चेतना के योग्य कोई गर्भ नहीं मिलता तो वो दूसरे देशों में भी जन्म ले-लेती है। और कभी - कभी तो आत्मा को पूरी पृथ्वी पर ही कोई ठीक गर्भ नहीं मिलता, तब वो किसी अन्य ग्रह पर चली जाती है।


शाहिदा : ऐसा कहा जाता है कि गीता में भगवान कृष्ण ने बताया है कि आत्मा को जल गला नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती और हवा सुखा नहीं सकती। फिर किसी व्यक्ति को नरक में दण्ड किस प्रकार मिलता है?


वेदांत : नरक में आत्मा नहीं बल्कि जीवात्मा जाती है। जीवात्मा उसे कहते हैं जो भौतिक संसार और अहंकार से बंधी होती है, जबकि आत्मा उसे कहते हैं जो इनसे मुक्त है। वैसे तो आत्मा एक मनुष्य के सिर के बाल के अग्रभाग के दस हज़ारवे भाग जितनी छोटी होती है। आत्मा एक प्रकार से परमात्मा श्री कृष्ण का ही भिन्न अंश है लेकिन ऐसा कभी नहीं होगा कि हमारी आत्मा कृष्ण के परम स्वरूप से एक हो जाये। अद्वैतवादी लोग कहते हैं कि कृष्ण ने भी आत्मा को परब्रह्म के जैसे सर्वव्यापी यानी पूरे विश्व में एक साथ उपस्थित बताया है, लेकिन वो लोग अज्ञानतावश ऐसा कहते हैं। अद्वैतवादी लोग अध्याय 2 के श्लोक 24 की गलत व्याख्या करते हुए कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने आत्मा को सर्व्यापी कहकर ये बता दिया है कि आत्मा परमात्मा का अंश ही है, और बस कुछ समय के लिए वो भौतिक जगत से बन्ध गई है। और बाद में फिर आत्मा को जब ये पता चल जाएगा कि वो परमात्मा है, तब वो वापसी अद्वैत परमात्मा से जुड़ जाएगी। हाँ! ये बात सच है कि आत्मा परमात्मा यानी भगवान श्री कृष्ण का ही भिन्न भाग है। पर इस श्लोक में भगवान का तात्पर्य आत्मा को सर्व्यापी परमात्मा यानी विष्णु तत्व बताना नहीं है, बल्कि भगवान का तात्पर्य ये है कि आत्मा और जीवात्मा के शरीर वाले लोग इस पूरे विश्व में भरे हुए हैं। क्योंकि अगर हर आत्मा ही परमात्मा है तो भगवान ने यहाँ अखंडित शब्द का भी प्रयोग किया है, जब परमात्मा और आत्मा अखंडित है फिर लोग आत्मा बनकर इस जगत से कैसे बन्ध सकते है? अगर आत्मा को इस जगत में आना हो तो उसे परमात्मा से अलग होना ही पड़ेगा, इस तर्क से तो अखंडित आत्मा से भौतिक जगत बन ही नहीं सकता है। भले ही वो स्वर्गलोक हो, सूर्यलोक हो या कोई भी दूसरा ग्रह हो, पर किसी भी भौतिक जगत में रहने वाले और उससे आसक्त लोगों को भी जीवात्मा या आत्मा ही कहा जाता है। बस इसी प्रकार से आत्मा पूरे विश्व में व्याप्त है, यानी सर्व्यापी है। वैसे तो प्रत्येक जीवात्मा का पुनर्जन्म होना तय है, लेकिन ये सोचकर इस जन्म को गवा मत देना। क्योंकि आपका अगला जन्म जब होगा तब पृथ्वी पर बहुत वर्ष बीत चुके होंगे। और उस समय आपके लिए भक्ति करना लगभग असंभव हो जाएगा।


शाहिदा : लेकिन अद्वैतवादी लोग तो हमेशा ये कहते हैं कि वैष्णव लोग शास्त्रों की शिक्षा को नहीं समझते। वो लोग कहते हैं कि ईश्वर तो हर स्थान पर उपस्थित है लेकिन उन्हें न कोई देख सकता है और न अनुभव कर सकता है।


वेदांत : ये तो सच है।


शाहिदा : लेकिन वो लोग इस विषय को अलग प्रकार से बताते हैं। वो कहते हैं कि हम उसी ब्रह्म में एक हो जाएंगे मरने के उपरांत।


वेदांत : फिर उनको कैसे पता कि ऐसा कुछ वास्तव में होता है?


शाहिदा : वो धार्मिक ग्रंथों से ऐसा बताते हैं।


वेदांत : जब उस अकथनीय, अकल्पनीय ब्रह्म को न कोई देख सकता है और न अनुभव कर सकता है तो फिर उन ग्रंथों की रचना करने वालों को भी कैसे पता कि ऐसा कुछ होता भी है अथवा नहीं?


शाहिदा : हाँ ये बात तो एकदम उचित है। लेकिन कई अद्वैतवादी ऐसा भी कहते हैं कि वेदों की रचना उस ब्रह्म ने की है।

वेदांत : केवल अज्ञानी लोग ही वेदों को अकथनीय ब्रह्म से उत्पन्न हुआ मानते हैं, क्योंकि ऐसा है तो वेदों की रचना करने से ही उस अकथनीय ब्रह्म की एक कथा तो बन ही जाएगी। वेदों में जिस अकल्पनीय, अकथनीय, सर्व्यापी ब्रह्म का वर्णन किया गया है वो भी भगवान कृष्ण का ही एक रूप है। लेकिन उस रूप को ही पूर्ण परम ईश्वर भगवान का रूप मान लेना मूर्खता होगी। अकथनीय, अनजान, अकल्पनीय, सर्व्यापी ब्रह्म को ही पूर्ण ईश्वर मानने पर आपमें और नास्तिक लोगों में कोई अंतर नहीं रह जाएगा।